Thursday, December 3, 2009

प्रशासन का प्रयास

जनपद प्रदर्शनी एवं पशुमेला इटावा द्वारा आयोजित इटावा नुमायश (इटावा महोत्सव) को पूरे १०० वर्ष हो गए हैं लिहाजा शताब्दी वर्ष के इटावा महोत्सव का शुभारम्भ २५ नबम्बर २००९ को हुआ। भ्रष्टाचार को रोकने की दिशा में प्रशासन का प्रयास प्रशंसनीय तो माना जा रहा है, साथ ही कई सबाल भी खड़े हो गए हैं।
पहले प्रत्येक संयोजक को बजट के आधार पर चैक के माध्यम से धनराशि उपलब्ध करा दी जाती थी, तमाम संयोजक मनमाने तरीके से फर्जी बिल पेश कर खर्चा शो कर देते थे, कुछ लगनशील संयोजक अपनी जेब से बजट से भी ज्यादा खर्चा करते रहे, और कुछ ईमानदारी का परिचय देकर कार्यक्रम को भव्यता प्रदान करते रहे। इस भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाते हुए अध्यक्ष/जिलाधिकारी जी०एस० प्रियदर्शी तथा जनरल सेक्रेटरी/ अपर जिलाधिकारी रामकिशन शर्मा ने नई व्यवस्था के तहत कार्यकारिणी के परामर्श पर संयोजक तो बना दिए मगर किसी को कोई धनराशि देने की बजाय खर्चे की मद पूछ कर गतवर्ष के मुकाबले डेढ़ गुना खर्चा करने का वचन दिया। प्रत्येक कार्यक्रम के आमंत्रण-पत्रों की छपाई, बैनर, फूलमाला, नाश्ता, भोजन, आगंतुकों के यात्रा व्यव से लेकर पारिश्रमिक तक सभी कार्यों को प्रशासन अपने हाथ में लिए है। खालीजेब रहने के कारण कुछ संयोजक व कार्यकारिणी सदस्य नाखुश हैं और विद्रोह के मूड में प्रशासन व कार्यकारिणी के संवैधानिक अधिकारों व कर्तव्यों का विश्लेषण करने में लगे हैं।

नई व्यवस्था से उठे कई सबाल---
१- भ्रष्टाचार घटा या बढ़ा?
माना कि संयोजक घपलेबाजी करते थे, अब नही कर पारहे हैं। किंतु प्रशासन स्तर पर जो व्यवश्था की गयी है उससे प्रशासनिक अधिकारी, बाबू तथा दलालों की पौबारह है जमकर कमीशनखोरी के रूप में। फूलमाला से लेकर भोजन तक क्वालिटी के मुकाबले ज्यादा भुगतान दर्शाया जा रहा है।
२- उदघाटन के दिन मार्चपास्ट का बजट एक लाख रुपये था, वह कहाँ खर्चा हुआ?
३- संयोजक या बेगारी?
संयोजक तय क्यो किए गए? सिर्फ़ नाम के लिए बेगार को, अपना नियमित काम रोककर कार्यक्रम में जुटे इन संयाजकों को अपनी जेब से फ़ोन, पेट्रोल आदि व्यय करना पड़ता है, तो फ़िर वे सिर्फ़ बेगारी ही हुए।
४- टके सेर भांजी, टके सेर खाजा ?
२९ नवम्बर की रात स्थानीय कवि सम्मेलन हुआ, प्रदशनी के सदस्य विश्वभर नाथ भटेले संयोजक थे। कार्यक्रम पूरी रात सफलता पूर्वक चला। एक दिन पूर्व प्रशासन ने कवियों की सूची मांगी - पिछले वर्ष किसे कितना पारिश्रमिक दिया गया था ? संयोजक ने सब कुछ बताया- वरिष्ठता क्रम में ५०१,२५१,२०० व अनाहूत को १०० दिए गए थे, प्रशासन ने वरिष्ठता क्रम नहीं रखा और सभी को बराबर ५०० रुपये का भुगतान किया ७ अनाहूतो को १००-१०० दिए गए, क्या यह अंधेर नगरी नहीं? जहाँ ५० -६० वर्षों से निरंतर इस मंच की शोभा रहे बुजुर्ग काव्य साधक और कविता की पाठशाला में ककहरा पढ़ने वाले नवोदित कवि को बराबर तौला गया।
प्रशासन का तर्क है कवियों में असमानता को मिटाया गया है तो क्या २६ दिसंबर के अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में भी समानता का सिद्धांत दिखाई देगा?
देवेश शास्त्री