रामायण काल में सिर्फ़ एक बिभीषण था, रामभक्त।
घर का भेदी लंका ढाए। शायद इसीलिए, कोई भी अपने पुत्र का नाम हरगिज बिभीषण नहीं रखता।
लंकाधिराज रावण द्वारा निष्कासित बिभीषण जैसे ही रामदल में पहुँचे।
जातहि राम-तिलक तेहि सारा
जो सम्पति शिव रावनहि, दीन्ह दिए दसमाथ।
सोई सम्पदा विभीशनहि , सकुच दीन्ह रघुनाथ॥
आज राजनीति में बिभीषण ही बिभीषण दिखाई दे रहे हैं।
लंका ढहाने का दंभ भरते हुए राम तिलक की चाहत रखते हैं।
ताज्जुब, चारों ओर हैं रावण ही रावण,
जो बिभीषण के नाभिस्थ अमृत का रहस्य न खोलदेने के भय से,
विरोधी दल में सेंध लगाकर बिभीषण पैदा करते हैं
मंत्रिपद कातिलक कर विरोधी के नाभिस्थ अमृत का रहस्य जानने को।
सत्य स्वरुप राम कहीं हैं ही नहीं,
जो - निशिचर हीन करहु महि भुज उठाय प्रण कीन्ह ।
जैसा जनहित में लगा हो
सभी लुटेरे रावण है फ़िर कैसा राम-तिलक?
ये पब्लिक है सब जानती है, इसीलिए चुनाव में नकार देती है बिभीषनो को।
यही तो है भारतीय जनता का जंग-ऐ इमान।
Monday, November 2, 2009
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