अनाचार अत्याचार दुराचार व्यभिचार भ्रष्टाचार इस समय कण कण में व्याप्त है। सभी लोग बुरी तरह त्रस्त हैं। रिश्वतखोरी अब सामान्य कार्य व्यवहार का रूप ले चुकी है। मंत्री से लेकर संत्री तक कथित विरागी संत से लेकर जन सामान्य तक सभी भ्रष्ट हो चुके हैं। नैतिकता धर्म इमान सत्य अहिंसा व सदाचार सभी कुछ सिर्फ़ किताबों और व्याख्यानों तक सीमित हैं स्वयं चिन्तक व व्याख्याता धनतृष्णा में भ्रष्ट आचरण करते हुए बगुलाभगत बने सदाचारी सिद्ध कर रहे हैं।
इस तरह भ्रष्टाचार तेजी से शिष्टाचार का रूप धारण करता जा रहा है। अर्द्धशताब्दी के अन्दर भ्रष्टता अपने चरम पर पहुंच गई। लिहाजा सभी इस भ्रष्ट बातावरण से तंग तो आ गए हैं किंतु भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने की वजाय निराशावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए समझोतावादी बने हुए हैं। आख़िर इस हालत के लिए जिम्मेदार कौन है?

Badhiya prayas hai bandhu
ReplyDeleteढूंढो फिर इस दौर में अपने-२ यार
ReplyDeleteबहुमंजिले बाज़ार में खोया है संसार
भाग दौड़ में शहर धुत राजनीति में गाँव
ओ सुकून तू है कहाँ मनवा पूछे ठांव ?-ललित