आसक्ति नहीं रही। स्वाभिमान के साथ ४२ साल के जीवन त्याग किया है । भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम १९९१ में छेड़ी थी वह भी स्वनाम धन्य स्वतंत्रता सेनानी के खिलाफ जो नरक भोगते हुए पिछले साल ही शरीर छोड़ गया । लम्बी कहानी है ।
ग्यानधन दिगंबर जैन संस्कृत विद्यालय , दिगंबर जैन प्राइमरी पाठशाला को १९९० से १९९६ तक सेवा देकर ऐसे छोड़ दिया मानो हम यहाँ रहे ही न हों । मेरे पिताजी की आसक्ति इस पाठशाला से ऐसी रही कि १९५८ से मरने तक (१८ सितम्बर २०१०) तक पढाया । वेतन सुनकर रोने लगोगे - १९५८ में ३० रुपये फिरभी ठीक थे ५२ साल में वेतन बृद्धि किस गति से हुई- २०१० में मिलते थे मात्र ३५० रुपये यानि प्रति दिन १२ रुपये से भी कम ।
मैं १९९६ से २००८ तक इंटर कालेज में संस्कृत प्रवक्ता रहा यहाँ आसक्ति थी , मगर शिष्या के लिए नौकरी छोड़ना धर्म माना ।
इस बीच डिवैन लाइट, कारगिल शहीद, ब्लू हैविं में भी पढाया कुछ जगह से आज तक पैसे ही नहीं मिले। २००४ की यह कहानी है। २००८ में एक नक़ल माफिया में फस गया जहा पढाई होती ही नहीं है प्रदेश के कौने-कौने से ही नहीं अन्य राज्यों से भी विद्यार्थी नाम जद होते हैं । जैसे तैसे ४ महीने बाद मुक्त हुआ , प्रसाद बंटा, प्राण किया अब कहीं नहीं । सेवा nइवृत्ति का सुख अनुभव हुआ
२५ साल की पत्रकारिता में भी आसक्ति नहीं , एक छूटती रही अगली मिलाती रही अखबार की नौकरी। कोई यह कह दे की मैंने चाय पिलाकर खबर छपाई तो शारीर छोड़ दूंगा। सविका, मधावसंदेश, देशाधर्म, इटावा मेल , दिनरात, अमर उजाला , हिंदुस्तान , आज, नव भारत, दल २५ साल की पत्रकारिता में भी आसक्ति नहीं , एक छूटती रही अगली मिलाती रही अखबार की नौकरी। कोई यह कह दे की मैंने चाय पिलाकर खबर छपाई तो शारीर छोड़ दूंगा। सविका, मधावसंदेश, देशाधर्म, इटावा मेल , दिनरात, अमर उजाला , हिंदुस्तान , आज, नव भारत, DLA में अनासक्त सेवा।
इष्टिका पूरी अकादमी की गतिविधियाँ । न कभी चंदा हुआ न किसी योजना से जुड़ने की आकांक्षा।
इटावा के हजार साल के संपादन का ठेका क्यों टुटा?
२२ सितम्बर की घटने के बाद १५ दिन अचेत रहने के बाद । एम्स अथवा लाखानाऊ में इलाज के अरविंद केजरीवाल व संजय आजाद का प्रस्ताव क्यों ठुकराया । नया को-आर्डिनेटर बनाये जाने का बार - बार अनुरोश किया । जो नहीं माना गया , बार- बार कहा गया चिंता मत करो । आपकी सत्य निष्ठां पर किसी को संदेह नहीं । जब तक स्वस्थ नहीं होंगे तब तक इटावा में कोई कार्यक्रम नहीं होगा। आप पुराने को-आर्डिनेटर हैं और रहेंगे।
१७-१८ नबम्बर की ट्रेनिंग में गए ३ मैं से एक मात्र ने बयां जारी कर को -आर्डिनेटर देवेश शास्त्री से सावधान किया और कहा वे स्वयं भू हैं। जो कुछ नहीं है वही सब कुछ है । मेरी अभी भी को-आर्डिनेटर पद से कोई आसक्ति नहीं मगर यह षड्यंत्र सियासी है। को-आर्डिनेटर का तात्पर्य और इण्डिया अगेंस्ट करप्शन के मर्म लो न जानने वालो के कृत्य से का यह प्रभाव रहा - रामगोपाल अन्ना की उपवास में कह बैठे इटावा में अन्ना की टोपी लगाये भ्रष्ट कोग बैठे हैं । ये सब क्या है? चंदाखोरों ने किया मेरी जिंदगी का सौदा- हादसे में अचेत हुए शास्त्री के ही कथित साथी ने रिपोट लिखाई । होस आया तो मामले को जानने की लोशिश की तो पाता चला राजी नामा हो चूका है। कैसा राजीनामा ? जानने की कोशिश की तो उससे कोई जबाब नहीं मिला। सत्य-निष्ठां पर केंद्री आन्दोलन क्या पात्र व्यक्तियों के हाथ में है? यही पीड़ा है।
आगे हम उसका खुलाशा करेंगे की इलाहाबाद में देश भर में को-आर्डिनेटर न होने की बात कहने का राज़ क्या है।

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